Friday, March 6, 2009
बापू की निज वस्तुओ के बाद अब पारम्परिक धान की वापसी भी जरुरी
पूरा लेख यहाँ पढे
कब होगा छत्तीसगढ मे “औषधीय धान क्रांति” का सूत्रपात?
- पंकज अवधिया
Sunday, November 23, 2008
मधुमेह की वैज्ञानिक रपट मे प्रगति
http://newswing.com/?p=1989
अन्य उपयोगी कडियाँ
http://knol.google.com/k/pankaj-oudhia/type-ii-diabetes-and-medicinal-rice/3nerdtj3s9l79/5#
http://knol.google.com/k/pankaj-oudhia/type-ii-diabetes-and-traditional/3nerdtj3s9l79/7#
Tuesday, May 20, 2008
वनस्पतियो के साधारण प्रयोग से बचे मच्छरो से
http://hgdp.blogspot.com/2008/05/blog-post_21.html
Monday, May 19, 2008
अतिथि देवो भव: : वर्तमान परिपेक्ष्य मे कितना प्रासंगिक?
http://ecoport.org/ep?SearchType=reference&ReferenceID=557477
Friday, May 2, 2008
क्या आपने हल्दी के पेटेंट का यह नया आवेदन पत्र देखा है?
हल्दी के पेटेंट होने की बात हम सभी समय-समय पर करते रहते है। हल्दी अनंत काल से भारत मे प्रयोग होती रही है। इसके बहुत से उपयोग दस्तावेजो के रुप मे उपलब्ध है पर ज्यादातर ज्ञान अब भी पारम्परिक चिकित्सको के पास है। नेट पर सर्फिंग करते समय अचानक ही मेरी नजर इस पेटेंट के आवेदन पत्र पर पढी जिसमे हल्दी और अदरक के साथ सोयाबीन के प्रयोग से मधुमेह नियंत्रण का दावा किया गया है। यह आवेदन भारतीयो द्वारा किया गया है। इसमे से ज्यादातर वे लोग है जिन पर एक समय मे भारतीय वनस्पतियो और इससे सम्बन्धित ज्ञान को बचाने का जिम्मा था। एक ओर हमारी सरकार कहती है कि दस्तावेजीकरण नही हुआ है। दूसरी तरफ हमारे वैज्ञानिक हल्दी और अदरक से सम्बन्धित नुस्खो को पेटेंट कराने मे जुटे है। यह बात अजीब लगी और यह कभी भी हिन्दी मे जनसाधारण तक नही पहुँचेगी इसलिये मै ये पोस्ट प्रेषित कर रहा हूँ। आप सभी सक्षम लोगो से निवेदन है कि हल्दी पर इस पेटेंट की कोशिश पर नजर रखे ताकि भारतीय ज्ञान की रक्षा हो सके।
इस नुस्खे जैसे बहुत से नुस्खे मेरी मधुमेह से सम्बन्धित रपट मे है जो भारतीय पारम्परिक चिकित्सको के ज्ञान के आधार पर लिखी जा रही है। इसलिये मुझे लगता है कि इस पर भारतीयो का अधिकार होना चाहिये न कि चन्द लोगो का।
http://www.google.com/patents?id=PeGYAAAAEBAJ&dq=curcuma+longaCurcuma longa हल्दी का वैज्ञानिक नाम है।
Saturday, April 26, 2008
इकोपोर्ट मे मेरा अब तक का योगदान
पिछले दिनो कुछ प्रबुद्ध पाठको ने इकोपोर्ट मे मेरे योगदान की जानकारी चाही थी। वैसे तो मै अपने लेखो मे कडियाँ देता रहता हूँ पर एक बार फिर से यहाँ कुछ उपयोगी कडियाँ प्रस्तुत है। पिछले माह एक कम्प्यूटर विशेषज्ञ को फीस देकर प्रिंट निकलवाने के लिये कुल पन्नो की संख्या गिनने का प्रयास किया था पर तीन लाख पन्नो के बाद इसे रोक दिया गया। यदि एक पन्ने के लिये एक रुपया भी पकडे तो भी तीन लाख से अधिक का खर्च बैठेगा। शोध आलेखो और रपट की सूची मे मधुमेह की वैज्ञानिक रपट भी है जिसमे अभी तक 75,000 पन्ने जोडे जा चुके है। यह दो वर्षो मे पूर्ण होगी और तब इसमे दो लाख से अधिक पन्ने होंगे। हाल ही मे ह्र्दय रोगो पर भी एक रपट आरम्भ की है। इसमे अभी तक दस हजार पन्ने लिखे गये है। प्रतिदिन 600-800 पन्ने का कठिन लक्षय रखा है। इकोपोर्ट विकी की तरह है। इसमे पैसा नही मिलता। शोध से लेकर दस्तावेजीकरण तक किसी से भी एक पैसा लिये बगैर ये योगदान दिया गया है। विकी के विपरीत इसमे विशेषज्ञ ही अपना योगदान दे सकते है। इकोपोर्ट ज्ञान के व्यवसायिक उपयोग की अनुमति नही देता। इकोपोर्ट मे रपट को कूट भाषा मे भी लिखा जा सकता है। इकोपोर्ट मे मैने 80,000 से अधिक चित्रो का योगदान किया है जिसमे से अब तक 32,000 से अधिक चित्र शामिल किये जा चुके है।
इसके अलावा 13,000 से अधिक आलेख बाटेनिकल डाँट काम पर भी है।
सैकडो शोध पत्र है जो दुनिया भर की शोध पत्रिकाओ मे प्रकाशित हुये है। कुछ की सूची यहाँ है।
हिन्दी मे किसानो के लिये तीन हजार लेख अब तक लिखे है जो देश भर की 18 से अधिक कृषि पत्रिकाओ मे प्रकाशित होते रहते है। इन्हे यूनीकोड मे फिर से टाइप कर नेट पर लाने के प्रयास कर रहा हूँ।
नवीनतम जानकारी आप मेरे होम पेज से प्राप्त कर सकते है।