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Tuesday, July 31, 2007

वृक्ष, भूत और भगवान

जिन वृक्षो से जुडे है
भूत या भगवान
वो अब भी है सघन आबादी मे
विराजमान

क्यो ना भूत और भगवान से
हर वृक्ष को जोड दे
हो सकता है इससे ही लोग
इन्हे काटना छोड दे

भय ही शायद रोक
पायेगा इंसान को
और बचा पायेगा वृक्षो की
जान को

धरती को बचाने अन्ध-विश्वास की चादर
ओढ ले
क्यो ना भूत और भगवान से
हर वृक्ष को जोड दे
हो सकता है इससे ही लोग
इन्हे काटना छोड दे

चलो अब हर वृक्ष पर
एक कथा लिखे
जिससे वह भूत से लेकर
भविष्य तक जुडा दिखे

जग हित मे पर्यावरण संरक्षण को
एक नया मोड दे
क्यो ना भूत और भगवान से
हर वृक्ष को जोड दे
हो सकता है इससे ही लोग
इन्हे काटना छोड दे

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित

Saturday, July 14, 2007

दादी, माँ और उनके नुस्खे

दादी, माँ और उनके नुस्खो

सभी से दूर हो रहे है

इसीलिये तो हम अपना आराम-चैन

और स्वास्थ्य सभी खो रहे है


चोट पर हल्दी लगाने से हम

कतराते है

फिर हल्दी के विदेशी पॆटेंट पर

अपनी त्यौरियाँ चढाते है


अंग्रेजी दवाओ को अपनाकर हम

विनाश के बीज बो रहे है

दादी, माँ और उनके नुस्खो

सभी से दूर हो रहे है

इसीलिये तो हम अपना आराम-चैन

और स्वास्थ्य सभी खो रहे है


गूलर जैसे पेडो के होते हम

फिल्टर का पानी पीते है

नीम को आँगन से हटाकर

एंटी-बाँयोटिक पर जीते है


तभी तो शरीर को जिन्दा लाश बनाकर

ढो रहे है

दादी, माँ और उनके नुस्खो

सभी से दूर हो रहे है

इसीलिये तो हम अपना आराम-चैन

और स्वास्थ्य सभी खो रहे है


चलो दादी, माँ और उनके नुस्खो को

वापस ले आये

अच्छा खाये और

चैन का जीवन पाये


उनकी छोडे जो विलासिता की

नींद सो रहे है

दादी, माँ और उनके नुस्खो

सभी से दूर हो रहे है

इसीलिये तो हम अपना आराम-चैन

और स्वास्थ्य सभी खो रहे है

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित

तो हमारे शहर अस्पतालो मे नही सोते

हर्रा, महुआ और बहेडा काश

तुम शहरो मे भी होते

तो हमारे शहर

अस्पतालो मे नही सोते


कीटो को मारने वाला जहर

अब हमे कीटो की तरह मार रहा है

बेस्वाद उत्पाद वो भी इतने ऊँचे दामो पर

बडी परेशानी मे डाल रहा है


काश मेरे किसान तुम जैविक फसले ही बोते

हर्रा, महुआ और बहेडा काश

तुम शहरो मे भी होते

तो हमारे शहर

अस्पतालो मे नही सोते


शहरो मे घर तो है पर

सारे रोगो के घर है

तन और मन दोनो ही मे

कीटाणुओ का असर है


काश बूढे पीपल और बरगद प्रदूषण मे

खून के आँसू ना रोते

हर्रा, महुआ और बहेडा काश

तुम शहरो मे भी होते

तो हमारे शहर

अस्पतालो मे नही सोते

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, June 27, 2007

फिर भी सभ्य कहलाते है

मौके-बेमौके बम फोडने का मौका
नही गँवाते है
लोगो का चैन हरते फिर भी
सभ्य कहलाते है

चन्द बम जिन्हे हम मिनटो मे
राख कर देते है
उतने पैसे न मालूम कितने
भूखो का पेट भर देते है

ये हमारी अय्याशी है जो बम निर्माता
बच्चो से यह जानलेवा काम करवाते है
मौके बेमौके बम फोडने का मौका
नही गँवाते है
लोगो का चैन हरते फिर भी
सभ्य कहलाते है

जानते है, किसी घर मे कोई मरीज
जब बम की आवाज से कराह्ता है
तो आपके नव विवाहित परिजन के लिये
उसका मन कडवाहट से भर जाता है

क्यो आशीर्वाद की जगह बददुआ पाते है
मौके बेमौके बम फोडने का मौका
नही गँवाते है
लोगो का चैन हरते फिर भी
सभ्य कहलाते है

आप क्या कर सकते है
जमाना ही ऐसा है
अरे ये तो बहाना बनाने
जैसा है

क्यो नही ऐसे आयोजनो का बहिष्कार
करते और करवाते है
मौके बेमौके बम फोडने का मौका
नही गँवाते है
लोगो का चैन हरते फिर भी
सभ्य कहलाते है

आप सहकर कोई बडा काम
नही कर रहे है
कान ही नही खराब कर रहे बच्चो मे
गलत संस्कार भी भर रहे है

क्यो नही बम के पैसो से फल खिलाकर
अपने बच्चो का स्वास्थ्य बनाते है
मौके बेमौके बम फोडने का मौका
नही गँवाते है
लोगो का चैन हरते फिर भी
सभ्य कहलाते है

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’

Tuesday, June 26, 2007

हर ओर कारे ही कारे

नयी कारे, पुरानी कारे
हर ओर कारे ही कारे
प्रदूषण से लड लड
हम हारे

अब तो मौसम भी बदल रहा है
या कहे बदला ले रहा है
ठन्ड मे सुकून देने वाला सूरज
अब सब कुछ जला दे रहा है

अब तो हम अपनी भूल स्वीकारे
नयी कारे, पुरानी कारे
हर ओर कारे ही कारे
प्रदूषण से लड लड
हम हारे

मौसम पर विश्व सम्मेलन कर
व्यर्थ चिंता जताना अब छोडे
खुद छोटे प्रयास कर
आस-पास के लोगो को जोडे

बातो मे ही ना गँवा दे पल सारे
नयी कारे, पुरानी कारे
हर ओर कारे ही कारे
प्रदूषण से लड लड
हम हारे

क़ारो को छोड कुछ पैदल भी
चल ले
ताकि अच्छा स्वास्थ मिले और
बच्चे साफ हवा मे पल ले

नये पेड नही लगा सकते तो
पुराने को ही पाले और सँवारे
नयी कारे, पुरानी कारे
हर ओर कारे ही कारे
प्रदूषण से लड लड
हम हारे

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’

Monday, June 18, 2007

’हत्या’ क्यो नही मानते है

वृक्षारोपण के नाम पर फिर
पतले विदेशी वृक्ष लगेंगे इस बार
और पुण्य का दम्भ भर कर
अपनी ही पीठ थपथपायेगी सरकार

सघन आबादी मे प्राण वायु का संचार
करते है पीपल और बरगद
पर आधुनिक योजनाकार मानते है
इन्हे विकास मे बाधक

यह जानते हुये कि ये ही
मिटा सकते है पर्यावरणीय विकार
वृक्षारोपण के नाम पर फिर
पतले विदेशी वृक्ष लगेंगे इस बार
और पुण्य का दम्भ भर कर
अपनी ही पीठ थपथपायेगी सरकार

वृक्ष मे जीवन है
यह सभी जानते है
फिर वृक्ष की कटाई को
’हत्या’ क्यो नही मानते है

पुराने वृक्षो को बचाने नये हरे कानूनो की है अब दरकार
वृक्षारोपण के नाम पर फिर
पतले विदेशी वृक्ष लगेंगे इस बार
और पुण्य का दम्भ भर कर
अपनी ही पीठ थपथपायेगी सरकार

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’