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Monday, September 10, 2007

क्या इसी जहर को अपने बच्चो को भी खिलाते हो

जहरीले रसायन डाल-डाल कर ये किसके लिये
सब्जियाँ उगाते हो ओ युवा किसान भाई
क्या इसी जहर को अपने बच्चो को भी
खिलाते हो ओ युवा किसान भाई

कौन कहता है जहरीले रसायन
अच्छी फसल के लिये जरूरी है
लगता है आपकी जानकारी
कुछ अधूरी है

अपने देशवासियो को रोगग्रस्त कर
भला कैसा सुख पाते हो ओ युवा किसान भाई
जहरीले रसायन डाल-डाल कर ये किसके लिये
सब्जियाँ उगाते हो ओ युवा किसान भाई
क्या इसी जहर को अपने बच्चो को भी
खिलाते हो ओ युवा किसान भाई

अभी भी है गाँव मे
वो बूढे किसान
जिन्हे पता है जैविक खेती के
गुर और ज्ञान

स्वाद और उत्पादन दोनो मिले तो फिर
पुरानी खेती को क्यो नही अपनाते हो ओ युवा किसान भाई
जहरीले रसायन डाल-डाल कर ये किसके लिये
सब्जियाँ उगाते हो ओ युवा किसान भाई
क्या इसी जहर को अपने बच्चो को भी
खिलाते हो ओ युवा किसान भाई

यदि लो मन मे
ठान
तो पल मे बन्द हो जाये
जहरीले रसायनो की दुकान

जानते हो यह सच तो आगे आकर
बीडा क्यो नही उठाते हो ओ युवा किसान भाई
जहरीले रसायन डाल-डाल कर ये किसके लिये
सब्जियाँ उगाते हो ओ युवा किसान भाई
क्या इसी जहर को अपने बच्चो को भी
खिलाते हो ओ युवा किसान भाई

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, August 24, 2007

बहुत गिना ली समस्याए हमने

बहुत गिना ली समस्याए हमने
चलो अब उन्हे सुलझाने की भी सोचे
खुद सुधरे समाज को सुधारे और
नयी समस्याओ को जन्मने से रोके

कहने को तो सम्वाद के माध्यम बढ गये
फिर हम क्यो अपनो से दूर हो रहे
पास-पास रह कर भी
अपनी-अपनी दुनिया बना, खो रहे

नही सम्भाल पायेंगे सबको
यूँ अकेले हो के
बहुत गिना ली समस्याए हमने
चलो अब उन्हे सुलझाने की भी सोचे
खुद सुधरे समाज को सुधारे और
नयी समस्याओ को जन्मने से रोके

किसानो की आत्महत्या से आरम्भ करे
फिर भ्रष्टाचार पर कसे नकेल
गाजर घास को भी न छोडे
हिंसा प्रेमियो को गर्त मे दे ढकेल

तब तक चिडिया न चुग जाये खेत
जब तक हम जागे सो के
बहुत गिना ली समस्याए हमने
चलो अब उन्हे सुलझाने की भी सोचे
खुद सुधरे समाज को सुधारे और
नयी समस्याओ को जन्मने से रोके

बन्द करे केवल कोसना और फिर कोसना
बार-बार कोसना
अरे समस्याओ का हल हमे ही
है खोजना

गुटबाजी से नही है, सुझाये समाधान
मन मे सच्ची भारतीयता के बीज बो के
बहुत गिना ली समस्याए हमने
चलो अब उन्हे सुलझाने की भी सोचे
खुद सुधरे समाज को सुधारे और
नयी समस्याओ को जन्मने से रोके

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित

Thursday, August 2, 2007

चलो अब किसान दशक मनाए

बहुत मना लिये विशेष दिवस और माह
चलो अब किसान दशक मनाए
भारतीय कृषि को
उच्चतम सोपान तक पहुँचाए

भले ही अब तक विकास किसानो का
विनाश करता रहा
और किसानो के हिस्से के सुख से
अमीरो के घर भरता रहा

पर अब अंतिम गाँव तक
सही विकास की गंगा बहाए
बहुत मना लिये विशेष दिवस और माह
चलो अब किसान दशक मनाए
भारतीय कृषि को
उच्चतम सोपान तक पहुँचाए

विदेशो की तकनीक को धता बता
स्वदेशी तकनीक से हो खेती
किसानो से भी हम सीखे
इसमे ही भलाई दिखाई देती

किसानी भाषा को शोध की भाषा बनाए
बहुत मना लिये विशेष दिवस और माह
चलो अब किसान दशक मनाए
भारतीय कृषि को
उच्चतम सोपान तक पहुँचाए

घाटे का सौदा समझी जाने वाली
खेती अब उन्नत बने
ताकि नयी पीढी का इसी मे
मन लगे

फिर सदियो तक कोई किसान आत्महत्या की
सोच भी ना पाए
बहुत मना लिये विशेष दिवस और माह
चलो अब किसान दशक मनाए
भारतीय कृषि को
उच्चतम सोपान तक पहुँचाए

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित

Friday, June 15, 2007

महलो को बना ले खेत

केवल घरो और खेतो को तोडकर ही
बन सकते है कारखाने
तो चले महलो को बना ले खेत
जैसे को तैसा
या जैसा देश वैसा भेष

अपने घर का छिन जाना
बहुत दुखदायी है
इस दर्द को वही असल मे जाने
जिसने चोट खायी है

क्यो चन्द सिक्को की चाह मे
गरीबो की बददुआ रहे है समेट
केवल घरो और खेतो को तोडकर ही
बन सकते है कारखाने
तो चले महलो को बना ले खेत
जैसे को तैसा
या जैसा देश वैसा भेष

नियमगिरि हो या नन्दीग्राम
किसान असहाय देख रहे है
नेता तो बस अपनी रोटी
सेंक रहे है

आखिर किस किससे बचे
प्रकृति ने छोडा तो अपनो ने लिया लपेट
केवल घरो और खेतो को तोडकर ही
बन सकते है कारखाने
तो चले महलो को बना ले खेत
जैसे को तैसा
या जैसा देश वैसा भेष

प्रेम और प्रकृति को छोड
चलो अब असल जीवन पर भी लिखे
क्यो न हम कवि
आम लोगो की लडाई मे भी दिखे

ऐसा लिखे कि शोषक़ॉ की जमात
सदा के लिये जाये चेत
केवल घरो और खेतो को तोडकर ही
बन सकते है कारखाने
तो चले महलो को बना ले खेत
जैसे को तैसा
या जैसा देश वैसा भेष

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’

Wednesday, June 6, 2007

मै भी इंसान हूँ

किसान मेलो मे

भीड बढाता

जिसे सपने

हर कोई दिखाता

मै भारत का किसान हूँ।

समझो मेरी व्यथा

मै भी इंसान हूँ॥

चार किताबे देखकर बना वैज्ञानिक,

मेरे सामने इठलाता

आलसी कह मेरा

मजाक उडाता

उसके बोलकर, मेहनत से ज्यादा

कमा लेने से मै हैरान हूँ

मै भारत का किसान हूँ।

समझो मेरी व्यथा

मै भी इंसान हूँ॥

हर कोई नयी फसल

मेरे सामने डाल जाता

और मेरी खेती को,

गलत बताता

जैसे मै उनकी तरह

हकीकत से अंजान हूँ

मै भारत का किसान हूँ।

समझो मेरी व्यथा

मै भी इंसान हूँ॥

“जय जवान जय किसान”

का नारा दिखलाता

फिर वही नेता

खेतो मे कारखाने

लगवाता

इन आस्तिन के साँपो से

मै परेशान हूँ

मै भारत का किसान हूँ।

समझो मेरी व्यथा

मै भी इंसान हूँ॥

कर्ज मे डूबे भाई को

रोज श्मशान ले जाता

फिर भी कर्ज लेने

सरकारी फरमान आ जाता

इन कर्ज तले दबाने वालो से

हलाकान हूँ

मै भारत का किसान हूँ।

समझो मेरी व्यथा

मै भी इंसान हूँ॥

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’

Sunday, May 27, 2007

मै सोचता हूँ

क़ाश! जहरीले रतनजोत पर बहाया जा रहा पैसा
विदर्भ के किसानो को मिल जाता
क़र्ज तले दबे भूमि पुत्रो का
चेहरा खिल जाता

क्रिकेट मे बह रहा देश का पैसा
कुछ पल के लिये विदर्भ की ओर बह जाता
तो कर्ज मे दबा,
परिवार प्रमुख जीवित रह जाता

वायु यानो मे रोज सफर करने वाला,
समय की कमी का रोना रोता नेता
क़ुछ देर घर मे रुकता,
और खर्च किसानो को देता

तो विदर्भ के घरो मे फिर चूल्हा जल जाता
क़र्ज तले दबे भूमि पुत्रो का
चेहरा खिल जाता

दाता ही ना होगा तो हमे खिलायेगा कौन,
अपने सुख के लिये,
क्यो है हम इस पर मौन

क़रगिल के लिये जो जस्बा दिखाया था
उसी की अब फिर है जरुरत
ओ युवाओ! तुम्ही बदल सकते हो,
इस देश की सूरत

अन्नदाता को आदर देने वाला देश ही
फलता-फूलता है
अपने देश की तरह जहाँ रोज किसान
फांसी मे नही झूलता है

कह रहा हूँ आपको अपना जानकर
दूसरा होता तो कह ना पाता

क़ाश! रतनजोत पर बहाया जा रहा पैसा
विदर्भ के किसानो को मिल जाता
क़र्ज तले दबे भूमि पुत्रो का
चेहरा खिल जाता

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’

‘मेरा किसान रोता है’

मेरा किसान पारम्परिक फसल छोड रोता है।
मेरा किसान अब रतनजोत बोता है॥

मेरा किसान भोला है जो बातो मे आ जाता है
इतने छल के बाद भी धोखा ही पाता है
हर बार उसी के साथ ऐसा क्यो होता है
मेरा किसान फसल छोड रोता है।
मेरा किसान अब रतनजोत बोता है॥

कौन जाने, कौन खरीदेगा इसे,
नही बिका तो शिकायत कहेगा किसे,
इसे खाकर बीमार होते बच्चो को देखकर
मन मसोसता है।
मेरा किसान फसल छोड रोता है।
मेरा किसान अब रतनजोत बोता है॥

‘विनाश के बीजो’ का सियासी खेल,
वो क्यो रहा झेल,
करे कोई, भरे कोई,
ऐसा कही होता है।
मेरा किसान फसल छोड रोता है।
मेरा किसान अब रतनजोत बोता है॥

घाटे की फसल, घाटॆ का सौदा
तिस पर मौत देने वाला पौधा
उसने तो सुख के लिये सपने देखते
अपना खेत जोता है।
मेरा किसान फसल छोड रोता है।
मेरा किसान अब रतनजोत बोता है॥

‘वे’ उपजाउ जमीन को बंजर बता,
बना रहे सचमुच बंजर,
कैसा ये हित है
कैसा है ये मंजर,

अपनो से धोखा खा, मेरा किसान अब आपा खोता है।
मेरा किसान फसल छोड रोता है।
मेरा किसान अब रतनजोत बोता है॥

जिसकी खेती नही वही इसकी करता है बात,
दो दिन की चान्दनी, फिर अन्धेरी रात,
मरिग मरिचिका से मेरा किसान सपने संजोता है,
मेरा किसान फसल छोड रोता है।
मेरा किसान अब रतनजोत बोता है॥



पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’


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