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Saturday, July 14, 2007

तो हमारे शहर अस्पतालो मे नही सोते

हर्रा, महुआ और बहेडा काश

तुम शहरो मे भी होते

तो हमारे शहर

अस्पतालो मे नही सोते


कीटो को मारने वाला जहर

अब हमे कीटो की तरह मार रहा है

बेस्वाद उत्पाद वो भी इतने ऊँचे दामो पर

बडी परेशानी मे डाल रहा है


काश मेरे किसान तुम जैविक फसले ही बोते

हर्रा, महुआ और बहेडा काश

तुम शहरो मे भी होते

तो हमारे शहर

अस्पतालो मे नही सोते


शहरो मे घर तो है पर

सारे रोगो के घर है

तन और मन दोनो ही मे

कीटाणुओ का असर है


काश बूढे पीपल और बरगद प्रदूषण मे

खून के आँसू ना रोते

हर्रा, महुआ और बहेडा काश

तुम शहरो मे भी होते

तो हमारे शहर

अस्पतालो मे नही सोते

पंकज अवधिया दर्द हिन्दुस्तानी

(c) सर्वाधिकार सुरक्षित

Monday, June 18, 2007

’हत्या’ क्यो नही मानते है

वृक्षारोपण के नाम पर फिर
पतले विदेशी वृक्ष लगेंगे इस बार
और पुण्य का दम्भ भर कर
अपनी ही पीठ थपथपायेगी सरकार

सघन आबादी मे प्राण वायु का संचार
करते है पीपल और बरगद
पर आधुनिक योजनाकार मानते है
इन्हे विकास मे बाधक

यह जानते हुये कि ये ही
मिटा सकते है पर्यावरणीय विकार
वृक्षारोपण के नाम पर फिर
पतले विदेशी वृक्ष लगेंगे इस बार
और पुण्य का दम्भ भर कर
अपनी ही पीठ थपथपायेगी सरकार

वृक्ष मे जीवन है
यह सभी जानते है
फिर वृक्ष की कटाई को
’हत्या’ क्यो नही मानते है

पुराने वृक्षो को बचाने नये हरे कानूनो की है अब दरकार
वृक्षारोपण के नाम पर फिर
पतले विदेशी वृक्ष लगेंगे इस बार
और पुण्य का दम्भ भर कर
अपनी ही पीठ थपथपायेगी सरकार

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’