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Thursday, March 20, 2008

शराब इस बार फिर तुम होली मनाना

इस बार फिर बोतल से निकलकर

आम लोगो के तन-मन मे घुस जाना

उनसे अपशब्द कहलवाना

शराब इस बार फिर तुम होली मनाना


परेशान है हर शख्स मेरे देश का

मुश्किल है उसके लिये सच कह पाना

पीकर तुम्हे वह सब कुछ है कहता

मिल जाता उसे बहाना


सबकी ही नही अपनी नजरो मे भी उसे गिराना

शराब इस बार फिर तुम होली मनाना


जानते है सब, कैसे करती हो

तुम बर्बाद

हम ही है जिनके बल पर हो

तुम आबाद


मनुष्य़ॉ से सीखे जग, अपने पैरो मे कुल्हाडी चलाना

इस बार फिर बोतल से निकलकर

आम लोगो के तन-मन मे घुस जाना

उनसे अपशब्द कहलवाना

शराब इस बार फिर तुम होली मनाना

पंकज अवधिया दर्द हिन्दुस्तानी

© सर्वाधिकार सुरक्षित

होली मे

हरे-भरे पेडो को भूले अब चलो

मन के अहंकार को जला दे होली मे

जो बुरे विचार मन को है भटकाते

उन्हे मिट्टी मे मिला दे होली मे


उनकी भी सुध ले जो नही है

खुशी मनाने मे सक्षम

जिनके घर चूल्हे न जलते

यदि एक दिन भी न हो श्रम


कुछ बचा ले और

इससे भूखो को कुछ खिला दे होली मे

जो बुरे विचार मन को है भटकाते

उन्हे मिट्टी मे मिला दे होली मे


खूब रंग लिया खुद को

बाहर से

इस बार मन को रंग लेना

भीतर से


शायद ये पत्थर होते मन को

फिर जिला दे होली मे

जो बुरे विचार मन को है भटकाते

उन्हे मिट्टी मे मिला दे होली मे


हर बार मनाया उसने, इस बार

खुद भी मना ले

आज के दिन से शराब को अपना

दुश्मन बना ले


होश मे रहकर परिवार मे

खुशी का कमल खिला दे होली मे

जो बुरे विचार मन को है भटकाते

उन्हे मिट्टी मे मिला दे होली मे

हरे-भरे पेडो को भूले अब चलो

मन के अहंकार को जला दे होली मे

पंकज अवधिया दर्द हिन्दुस्तानी

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Wednesday, February 20, 2008

मै प्रविष्ट हुआ काव्य क्षेत्र मे

ह्र्दय की गहराइयो मे छिपे

मर्म को

मष्तिष्क मे छिपे

मानव-धर्म को

आत्मा मे छिपे

पुण्य-कर्म को

समेटकर औ

जीवन सत्यो को भरकर नेत्र मे

मै प्रविष्ट हुआ काव्य क्षेत्र मे


आम-नागरिको के

जीवन से

बरसो से दुख सहते

मन से

और फिर भी आशीष के शब्द कहते

जन से

भेटकर औ

जीवन सत्यो को भरकर नेत्र मे

मै प्रविष्ट हुआ काव्य क्षेत्र मे


दुख देश का

दुख परिवेश का

और दुख

समय-विशेष का

देखकर औ

जीवन सत्यो को भरकर नेत्र मे

मै प्रविष्ट हुआ काव्य क्षेत्र मे

पंकज अवधिया दर्द हिन्दुस्तानी

© सर्वाधिकार सुरक्षित

स्कूल के दिनो मे लिखी कविता।

Monday, February 18, 2008

क्या यही है भारत जो ---

महापुरुषो की धरती मे

ये कैसा अन्धकार है

परोपकार के सारे प्रयत्न

यहाँ क्यो बेकार है

यहाँ दिन है या रात है

क्या यही है भारत जो तेजस्वियो से भरा

नभ-पटल सा विराट है


धरती के इस स्वर्ग मे

किसानो का उजडे है संसार

पेट भरने वाला ही रहे दुखी

समाज मे ये कैसा है विकार

कही सत्य ने असत्य को तो नही दे दी मात है

क्या यही है भारत जो तेजस्वियो से भरा

नभ-पटल सा विराट है

शाँति की भूमि मे

शस्त्रो का अम्बार है

स्वच्छ नभ-पटल पर

क्यो बारुद का गुबार है


ये स्थान आशा की किरण बिखेरने वाला नही

शायद मौत का घाट है

क्या यही है भारत जो तेजस्वियो से भरा

नभ-पटल सा विराट है

पंकज अवधिया दर्द हिन्दुस्तानी

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स्कूल के दिनो मे लिखी कविता जब पंजाब मे आतंकवाद चरम पर था

Sunday, February 17, 2008

प्रार्थना

हे प्रभु! हमे न सूखा,

न बाढ चाहिये

न सूखा

न तूफानी आषाढ चाहिये

हमे चाहिये सीमित जल।

सुनहरा कल।

पंकज अवधिया दर्द हिन्दुस्तानी

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स्कूल के दिनो मे लिखी कविता।

मै बडा हो गया हूँ

जब मेरे भविष्य सपने कल्पना मात्र बन गये

मेरे आदर्श नेता-गण घृणा के पात्र बन गये

तब मुझे लगा कि मै बडा हो गया हूँ।


जब टूटने लगे बचपन के, मन के हवाई किले

जब सामने आने लगी जीवन की मुश्किले

तब मुझे लगा कि मै बडा हो गया हूँ।


जब बडे-बुजुर्गो का आशीर्वाद ले, करके उन्हे प्रणाम

जीवन-रथ पर चल पडा, लडने जीवन संग्राम

तब मुझे लगा कि मै बडा हो गया हूँ।

अपने पाँवो मे खडा हो गया हूँ॥

पंकज अवधिया दर्द हिन्दुस्तानी

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स्कूल के दिनो मे लिखी कविता।

Saturday, February 16, 2008

अश्रु और पानी

चार पंक्तियाँ-2

अश्रु और पानी

अश्रु तुम पानी की तरह बरसो
पर पानी तुम अश्रु की तरह मत बरसो
मानव तुम भी मानव पर बरसो प्रेम फुहार बन
उस पर शत्रु की तरह मत बरसो

पंकज अवधिया 'दर्द हिन्दुस्तानी'

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स्कूल के दिनो मे लिखी कविता।

अबकी बार होली

चार पंक्तियाँ-1

अबकी बार होली

तुम्हारी खुशी से
किसी का जीवन छिना
क्या तुम नही मना सकते एक होली
सूखी लकडियो के बिना

पंकज अवधिया 'दर्द हिन्दुस्तानी'

सर्वाधिकार सुरक्षित

- स्कूल के दिनो मे लिखी कविता

तुम कौन हो???

तुम कौन हो???

बिल्कुल मौन हो???


तुम वृक्ष हो तो

मुझे छाँव दो

तुम आश्रयदाता हो तो

मुझे गाँव दो


तुम पथ हो तो

मंजिल दो

तुम आशिक हो तो

दिल दो


तुम द्वार हो तो

मार्ग दो

तुम मन हो तो

उदगार दो


तुम शिक्षक हो तो

दिशा दो

तुम चाँद हो तो

निशा दो


तुम सूरज हो तो

शक्ति दो

तुम आत्मा हो तो

अभिव्यक्ति दो


तुम नेत्र हो तो

दृष्टि दो

तुम ईश्वर हो तो

नयी सृष्टि दो


तुम प्रियजन हो तो

परामर्श दो

तुम भाग्य हो तो

सुख सहर्ष दो


तुम जीवन हो तो

मुझे संघर्ष दो

तुम मौत हो तो

मुझे जीवन-निष्कर्ष दो

पंकज अवधिया दर्द हिन्दुस्तानी

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17 फरवरी, 1988 को लिखी कविता।

लकडी और लडकी

लकडी और लडकी दोनो मे

बडी समानता है

इन दोनो के साथ हमारा व्यवहार

हमारी अज्ञानता है


क्या बचपन, क्या यौवन।


अंत्यावस्था तक सब लडकी को

चोट पहुँचाते है

कभी उसे पीटते तो कभी

लकडी की तरह जलाते है


लोग-बाग लकडी को जला

ऊष्मा पाते है

लोग-बाग लडकी को जला

दानवी प्यास बुझाते है


लोग-बाग निर्दोष लकडी को

ठूंठ बनाकर छोड देते है

लोग-बाग निर्दोष लडकी को

पराया धन बताकर छोड देते है


लकडी धूप-छाँव सब

सह जाती है

लडकी भला उफ कब

कह जाती है


लडकी बेसहारे का सहारा

अन्धे की लाठी बन जाती

लकडी डूबते का किनारा

अन्धे की जीवन-साथी बन जाती

दोनो पुण्य पथ पर चलती है

फिर भी दोनो कटती है, जलती है

क्यो? क्यो? क्यो?

पंकज अवधिया दर्द हिन्दुस्तानी

© सर्वाधिकार सुरक्षित

स्कूल के दिनो मे लिखी कविता।

बन्धन

गज बन्धा आलान से

तलवार बन्धी म्यान से

लालची मोह से बन्धा

साधु बन्धे ध्यान से


गायक बन्धा गान से

विद्या बन्धी विद्वान से

बुरा बुराई से बन्धा

गुणी बन्धा सम्मान से


दानी बन्धा दान से

अहंकारी बन्धा अपमान से

सुन्दरी बन्धी श्रुंगार से

राजा बन्धा शान से


शराबी बन्धा मदिरापान से

आत्मा बन्धी इंसान से

इंसान बन्धा किससे?

इन्सान बन्धा भगवान से


पंकज अवधिया दर्द हिन्दुस्तानी

© सर्वाधिकार सुरक्षित

स्कूल के दिनो मे लिखी कविता।