Tuesday, July 3, 2007

भगवान की बुढिया

हरी धरती पर लाल चादर सी
भगवान की बुढिया विचर रही है
इस बात से अंजान कि मौत
हर पल इंतजार कर रही है

करोडो के इस देश मे मर्दानगी की दवाओ का
अब भी बोलबाला है
इस इंसानी भूख के लिये
फिर इनका तेल निकलने वाला है

इनकी अकाल मौत आँखो मे आँसू भर रही है
हरी धरती पर लाल चादर सी
भगवान की बुढिया विचर रही है
इस बात से अंजान कि मौत
हर पल इंतजार कर रही है

प्रकृति मे ये है क्योकि इनका
होना जरुरी है
मर्दानगी के तो बहुत से उपाय है
फिर क्या मजबूरी है

हमारे ऐसे ही लालचो से
प्रकृति अब चन्डी का रूप धर रही है
हरी धरती पर लाल चादर सी
भगवान की बुढिया विचर रही है
इस बात से अंजान कि मौत
हर पल इंतजार कर रही है

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’

‘भगवान की बुढिया’ एक विशेष प्रकार के मखमली मकोडे का नाम है जो कि मानसूनी वर्षा के दौरान जमीन से निकलते है। प्रतिवर्ष करोडो की संख्या मे इसे एकत्र कर कामोत्तेजक दवाओ का निर्माण किया जाता है। इसके कारण ये तेजी से खतम हो रहे है और इनके संरक्षण की जरुरत है। विस्तार के लिये यह लेख पढे
http://ecoport.org/ep?SearchType=reference&ReferenceID=557441


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