Thursday, June 14, 2007

पारम्परिक चिकित्सा नही है वैकल्पिक

अपने देश मे जन्मी पनपी
और फिर भी वैकल्पिक
पारम्परिक चिकित्सा के लिये
यह तर्क है अवैज्ञानिक

अनगिनत वैद्य आज भी
वैधता की बाट जोह्ते है
अपना दर्द भूलकर
दिन रात सेवा करते रहते है

इन प्रकृति पुत्रो की भी
सुध ले ले तनिक
अपने देश मे जन्मी पनपी
और फिर भी वैकल्पिक
पारम्परिक चिकित्सा के लिये
यह तर्क है अवैज्ञानिक

महंगी दवा और इलाज
भारतीयो पर भारी है
मरीजो को लूटने की मची
मारामारी है

फिर आधुनिक चिकित्सा से राहत मिलती है क्षणिक
अपने देश मे जन्मी पनपी
और फिर भी वैकल्पिक
पारम्परिक चिकित्सा के लिये
यह तर्क है अवैज्ञानिक

आओ! अब पारम्परिक चिकित्सा को
मुख्यधारा से जोडे
असली चिकित्सको को नीम-हकीम
कहना छोडे

और देखे वनौषधीयो के चमत्कार अलौकिक
अपने देश मे जन्मी पनपी
और फिर भी वैकल्पिक
पारम्परिक चिकित्सा के लिये
यह तर्क है अवैज्ञानिक

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’

3 comments:

अनुनाद सिंह said...

कविता अच्छी लगी और इसमे व्यक्त विचार बहुत ही मौलिक लगा।

रवि रतलामी said...

"...महंगी दवा और इलाज
भारतीयो पर भारी है
मरीजो को लूटने की मची
मारामारी है..."


ये बात सही है. जेनेरिक और ब्रांड नाम की दवाइयों की कीमतों में 600 -1000 प्रतिशत तक अंतर रहता है. पासवान ने कुछ घोषणाएं की थीं, परंतु वे दबी ही रह गईं.

36solutions said...

हमारी मूल चिकित्‍सा पद्धति को वैकल्पिक चिकित्‍सा का नाम देने का जो दर्द आपने इस कविता में प्रस्‍तुत किया है वह हम सब के लिए चिंतनीय है । कवि पंकज भईया को धन्‍यवाद ।