Tuesday, June 5, 2007

गुहार

ओ मौसम विज्ञानी, अबकी बार
चुप ही रहना,
मेघो को बरस जाने दे
फिर कुछ कहना।

तेरा विज्ञान समझ से
परे है
हर बार सफेद झूठ
बहुत परेशान करे है

कठिन है अब और सहना

ओ मौसम विज्ञानी, अबकी बार
चुप ही रहना,
मेघो को बरस जाने दे
फिर कुछ कहना।

बरसो का किसानी ज्ञान
और कहाँ तेरा किताबी ज्ञान
शुक्र मना जो तेरी नासमझी पर
कोई नही देता ध्यान

धरती पुत्रो से बहुत कुछ है
सीखना समझना

ओ मौसम विज्ञानी, अबकी बार
चुप ही रहना,
मेघो को बरस जाने दे
फिर कुछ कहना।

मानव ही नही मेघ भी
कोरी बातो से त्रस्त है
यही कारण है जो पानी वाले भाग
सूखे से ग्रस्त है

मानसूनी फुहारो की अब आने दे रैना

ओ मौसम विज्ञानी, अबकी बार
चुप ही रहना,
मेघो को बरस जाने दे
फिर कुछ कहना।

पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’

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