Sunday, February 5, 2012

मालिश वाली The Massage Girl भाग-1


मालिश वाली The Massage Girl

(पंकज अवधिया के अंग्रेज़ी उपन्यास "द मसाज गर्ल" के कुछ अनुवादित अंश)

"आपने अभी तक कपडे उतारे नही| चलिए मै आपकी मदद करती हूँ|" 

कपड़े तो उतरे हुए थे| पूरे नही पर जिस भाग में दर्द था और जहां मालिश करानी थी वहां के कपड़े तो उतारे जा चुके थे| फिर किस कपड़े की बात हो रही है?

"इतनी भी क्या बेसब्री है? तनिक रुकिए|" मैंने टालने की कोशिश की|

पर लगता था कि उसका रुकने का मन नही था|

एक दिन कितना बड़ा होता है मुझे आज इसका आभास हुआ| अलसुबह ही मुम्बई पहुंचा और एयर पोर्ट से उठा लिया गया| अचानक ही अपने को मुबई-पुणे मार्ग की पहाड़ियों पर पाया| मालिश के लिए नही आया था मै| बात गम्भीर थी| एक प्रसिद्ध सिने अभिनेता के पिता गंभीर रूप से बीमार थे| डाक्टरों ने जवाब दे दिया था और हाथ भी खड़े कर दिए थे| प्रोस्टेट कैंसर के शिकार थे वे| नाना प्रकार की दवाएं अब भी चल रही थी| देश-विदेश से जानकारों को बुला लिया गया था इस उम्मीद में कि शायद वे कुछ चमत्कार कर सके| मुझे भी अपने शहर से उठा लिया गया था| मैं लाख ना नुकुर करता रहा पर छोटा विशेष विमान आ जाने पर ना न कर सका| मैंने पुणे के पास करजत की पहाड़ियों में जाना तय  किया ताकि मैं रोगी की जीवनी शक्ति जानने के लिए कुछ प्रयोग कर सकूं जिनके आधार पर उचित जड़ी-बूटियों का सुझाव दे सकूं| प्राइवेट जेट की सुखद उड़ान के बाद पहाड़ियां कष्ट दे रही थी| फिर भी दो घंटे की चढाई के बाद जड़ी-बूटियों की खोज शुरू हो गयी|

शाम को जब थककर चूर हो गए तो वापस लौट आये| रोगी से दूसरे दिन सुबह मिलना था| थकान इतनी थी कि बिस्तर पर पड़ते ही नींद आ जाती| स्वभाव में कुछ चिडचिडाहट आ रही थी यानी शरीर अब आराम की जिद कर रहा था| सिने अभिनेता के सहयोगी मेरी दशा को ताड़ गए और तुरंत होटल की ओर रवाना कर दिया| होटल की शान देखते ही बनती थी| मुझे समुद्र की ओर वाला कमरा दिया गया ताकि मैं सुकून पा सकूं| अच्छी खातिरदारी की गयी| मैंने स्नान किया और फिर घर पर फोन से बात करने लगा|           

तभी कंधे पर कुछ गुदगुदी हुयी| कमरे में तो मैं अकेला था| कीड़ों की उम्मीद मैं नहीं कर सकता था, घने जंगल में किसी सरकारी रेस्ट हाउस में जो मैं नही था| आलीशान होटल था जहां ग्राहकों के आने से पहले उनको बिना बताये जहरीले कीटनाशकों का छिडकाव किया जाता है ताकि कीड़ों का नामोनिशान न रहे| खटमल हो भी तो कोने में दुबके बैठे रहे कम से कम ग्राहकों के सोते तक| फिर यह गुदगुदी कैसी? (क्रमश:) 

© सर्वाधिकार सुरक्षित 

Friday, July 24, 2009

हिन्दी ब्लाग जगत की वे बेहतरीन रचनाएँ जिन्होने मुझे प्रभावित किया-13

हिन्दी ब्लाग जगत की वे बेहतरीन रचनाएँ जिन्होने मुझे प्रभावित किया-13
- पंकज अवधिया

अटलाँटिक के उस पार : पहली बार अमेरिका


मार्च 19, 2008 को स्वप्नदर्शी जी के ब्लाग “स्वप्नदर्शी” के माध्यम से की गयी यह प्रस्तुति उनके संघर्ष और अथक परिश्रम की कहानी, उनकी अपनी जुबानी, कहती है। भारत मे संघर्ष कर रहे युवा शोधार्थीयो को इससे प्रेरणा मिल सकती है।

इस प्रस्तुति मे वे लिखती है-

“उत्तर-प्रदेश और बिहार के हायर-एजुकेशन कमीशन के इंटरव्यू के लिये भी पटना, इलाहाबाद की खाक छानी. उसके बाद और कई जगह इंटरव्यू दिये, और जिस तरह के वाहियात सवालो से सामना हुआ, उससे मन घ्रिणा से भर गया. एक भूतपूर्व कुलपति ने तो यहाँ तक कहा कि औरतो को रोजगार देने के मतलब एक पूरे परिवार की जीवीका पर लात मारने जैसा है, क्योंकि महिला घर नही चलाती. उसे नौकरी से सिर्फ जेब खर्च मिलता है. यारी दोस्ती मे एक सीनीयर वैग्यानिक ने यहा तक कहा कि महिलाओ को अगर वो खाते-पीते परिवार की है तो नौकरी नही करनी चाहिये। सिर्फ ऐसी ही हालात मे नौकरी करनी चाहिये, जब वो विधवा हो, भाई न हो और मा-बहन् का बोझ सर पर हो।

कुछ सलाह और चेतावनी ये भी मिली कि अमेरिका/युरोप गयी अविवाहित लड्कियो की शादी के बाज़ार मे कीमत कम हो जाती है, जबकि लडको की कीमत मे भारी इज़ाफा होता है। खैर ये सारी सलाहे मुझे पढे-लिखे लोगों से मिली, देश के कर्णधारो से, और उन लोगों से जो हमारी पीढी के एकादमिक भविष्य गढने का दम रखते है। “

http://swapandarshi.blogspot.com/2008/03/blog-post_19.html



भूमिका: हिन्दी ब्लाग परिवार मे शामिल होने के बाद मैने अनगिनत चिठ्ठे पढे और इनमे प्रकाशित विचारो/लेखो/निबन्धो/कहानियो ने मेरे जीवन को बहुत प्रभावित किया। यह मेरा कर्तव्य है कि मै फिर इन खूबसूरत मोतियो को आपके सामने प्रस्तुत करुँ ताकि आप हिन्दी ब्लागरो के अविस्मरणीय योगदान को एक बार फिर से जान सके।

Thursday, July 23, 2009

हिन्दी ब्लाग जगत की वे बेहतरीन रचनाएँ जिन्होने मुझे प्रभावित किया-12

हिन्दी ब्लाग जगत की वे बेहतरीन रचनाएँ जिन्होने मुझे प्रभावित किया-12
- पंकज अवधिया

26 दिसम्बर की वो सुबह


26 दिसम्बर, 2007 को ममता श्रीवास्तव जी के ब्लाग “ममता टीवी” के माध्यम से की गयी यह प्रस्तुति रोंगटे खडे कर देती है। ममता जी और उनका परिवार अंदमान मे आये भूकम्प और सुनामी के चश्मदीद गवाहो मे शामिल है।

इस प्रस्तुति मे वे लिखती है-

“हम लोग बात कर ही रहे थे कि तभी अचानक दूर से बड़ी ही तेजी से पानी आता दिखाई दिया तब हम लोगों कोें सामने थी जहाँ पानी ही पानी दिख रहा था। और उस पानी मे हमारे पतिदेव ने बिना रोके गाड़ी चलाई और जो १०० मीटर की दूरी सेकेंड्स मे पूरी होती थी उसे पार करने मे लग रहा था कि रास्ता ख़त्म ही नही हो रहा है। माने हमारी गाड़ी कछुए की रफ़्तार से चल रही थी । वो तो भगवान ने बचाया वरना अगर कहीं गाड़ी पानी मे रूक जाती तब तो .... ।“

http://mamtatv.blogspot.com/2007/12/2.html


भूमिका: हिन्दी ब्लाग परिवार मे शामिल होने के बाद मैने अनगिनत चिठ्ठे पढे और इनमे प्रकाशित विचारो/लेखो/निबन्धो/कहानियो ने मेरे जीवन को बहुत प्रभावित किया। यह मेरा कर्तव्य है कि मै फिर इन खूबसूरत मोतियो को आपके सामने प्रस्तुत करुँ ताकि आप हिन्दी ब्लागरो के अविस्मरणीय योगदान को एक बार फिर से जान सके।

Wednesday, July 22, 2009

हिन्दी ब्लाग जगत की वे बेहतरीन रचनाएँ जिन्होने मुझे प्रभावित किया-11

हिन्दी ब्लाग जगत की वे बेहतरीन रचनाएँ जिन्होने मुझे प्रभावित किया-11
- पंकज अवधिया

कुमाँऊनी होली : अलग रंग, अलग ढंग


मार्च 13, 2008 को माननीय काकेश जी ने अपने ब्लाग “काकेश की कतरने” के माध्यम से कुमाँऊनी होली के अलग-अलग रंगो की बेहतरीन प्रस्तुति दी थी। उनकी यह प्रस्तुति एक धारावाहिक के रुप मे है। एक बार पढना शुरु करो तो रुकने का मन ही नही होता है। होली पर इतना रोचक लेख मैने शायद ही कभी पढा हो।

इस प्रस्तुति मे वे लिखते है-

"इसमें मूलत: पुरुष भाग लेते हैं लेकिन आजकल महिलायें भी इसमें शामिल होती हैं. यह होली रात में शुरु होती है और अक्सर सुबह दो-तीन बजे तक चलती रहती है.होली का राग धमार से आह्वान कर पहली होली राग श्याम कल्याण में गाई जाती है. समापन राग भैरवी पर होता है. बीच में समयानुसार अलग-अलग रागों में होलियां गाई जाती हैं. सभी तरह के राग और ताल इन होलियों में प्रयोग किये जाते हैं. जैसे राग काफी, जंगला, खम्माज, साहना,जैजैवंती, झिंझोटी, भैरवी में क्रमश: जैसे जैसे थकान बढ़ती है, गाये जाते हैं. भीम पलासी, कलावती, हमीर राग भी चलता है.दादरा,कहरवा ताल सभी में होलियां गायी जाती हैं.होली को लोकप्रिय बनाने के भी प्रयास हुए.इसे लोकप्रिय बनाने के लिए जानकारों ने होली की धमार और चांचर ताल में परिवर्तन किया. सो, 14 मात्रा की धमार और चांचर तालें 16 मात्रा की हो गईं. रागों के अंग या चलन में भी थोड़ा-सा परिवर्तन किया गया. इससे होली गायन की एक नई शैली विकसित हुई और वह सहज आम जन की हो गई."

http://kakesh.com/2008/kumaoni-holi/

http://kakesh.com/2008/kumaoni-holi-part-2/

http://kakesh.com/2008/kumaoni-holi-3/

http://kakesh.com/2008/classical-holi-of-kumaon/


भूमिका: हिन्दी ब्लाग परिवार मे शामिल होने के बाद मैने अनगिनत चिठ्ठे पढे और इनमे प्रकाशित विचारो/लेखो/निबन्धो/कहानियो ने मेरे जीवन को बहुत प्रभावित किया। यह मेरा कर्तव्य है कि मै फिर इन खूबसूरत मोतियो को आपके सामने प्रस्तुत करुँ ताकि आप हिन्दी ब्लागरो के अविस्मरणीय योगदान को एक बार फिर से जान सके।

Thursday, July 16, 2009

हिन्दी ब्लाग जगत की वे बेहतरीन रचनाएँ जिन्होने मुझे प्रभावित किया-10

हिन्दी ब्लाग जगत की वे बेहतरीन रचनाएँ जिन्होने मुझे प्रभावित किया-10
- पंकज अवधिया

ओ पहाड, मेरे पहाड


नवम्बर 12, 2008 को घुघूती बासूती जी के ब्लाग “घुघूती बासूती” के माध्यम से प्रस्तुत की गयी यह कविता वास्तव मे उनके मन से उद्दाम वेग से निकली अभिव्यक्ति है। जो पहाडो मे जन्मा हो, वो भला पहाडो से दूर कैसे रह सकता है।

इस प्रस्तुति मे वे लिखती है-

ओ पहाड़, मेरे पहाड़,
बुला ले वापिस पहाड़
मन व्याकुल है पाने को
तेरी ठंडी बयार ।

स्वस्थ पवन का जोर जहाँ
घुघुती का मार्मिक गीत जहाँ
काफल पाक्यो त्यूल नईं चाख्यो
की होती गूँज जहाँ ।

हर पक्षी कितना अपना है
हर पेड़ जहाँ पर अपना है
कभी शान्त तो कभी चट्टानें
बहा लाने वाली तेरी नदियाँ ।

http://ghughutibasuti.blogspot.com/2008/11/blog-post_12.html

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Wednesday, July 15, 2009

हिन्दी ब्लाग जगत की वे बेहतरीन रचनाएँ जिन्होने मुझे प्रभावित किया-9

हिन्दी ब्लाग जगत की वे बेहतरीन रचनाएँ जिन्होने मुझे प्रभावित किया-9
- पंकज अवधिया


अरुण फूसगढी की कहानी

मई 3, 2008 को माननीय अजीत वडनेकर जी के ब्लाग “शब्दो के सफर” के माध्यम से “बकलमखुद” नामक प्रस्तुति मे माननीय अरुण अरोरा जी ने अपनी जीवन गाथा हम सबके सामने रखी जो एक धारावाहिक के रुप मे थी। इस जीवन गाथा से मैने उनके अथक संघर्ष को जाना। इस प्रस्तुति ने मुझे हौसला दिया कि किसी भी कठिन परिस्थिति मे हाथ-पैर ढीले कर बैठने से कुछ नही होगा। आज भी जब मै अवसादग्रस्त होता हूँ तो इस जीवन गाथा का आश्रय लेता हूँ।

इस प्रस्तुति मे वे लिखते है-

“तो बात रामपुर की हो रही थी सुंदर शहर ,और शहर वाले भी बहुत सुंदर दिल के. दुनिया मे भले ही रामपुरी चाकू मशहूर हो,पर रामपुर के लोग दिल मे उतर जाते है. यहा छह साल रहा इन छह सालो मे लगा मेरा घर यही है.इतना प्यार की समेटा ना जाये. जौली टी वी रामपुर मे मै एक ट्रेनी की तरह लगा था और जब छॊडी तब मै प्रबंधकों की गिनती मे आ चुका था. मालिको से प्यार मिला घर के बडे की तरह. जब मै वहां काम करता था तो दूसरो की तरह मै भी उन्हे कभी कभी गालियो से नवाजा करता था. दिन मे हम १२ से १६ घंटे काम करते थे ,लेकिन मै आज सोचता हूं ,आज मै जो कुछ हूं उन्ही की वजह से हूं. उन्होने काम करने की इतनी आदत डाल दी है कि मै छुट्टी वाले दिन भी घर मे नही रुक सकता.”

http://shabdavali.blogspot.com/2008/05/40.html

भूमिका: हिन्दी ब्लाग परिवार मे शामिल होने के बाद मैने अनगिनत चिठ्ठे पढे और इनमे प्रकाशित विचारो/लेखो/निबन्धो/कहानियो ने मेरे जीवन को बहुत प्रभावित किया। यह मेरा कर्तव्य है कि मै फिर इन खूबसूरत मोतियो को आपके सामने प्रस्तुत करुँ ताकि आप हिन्दी ब्लागरो के अविस्मरणीय योगदान को एक बार फिर से जान सके।

हिन्दी ब्लाग जगत की वे बेहतरीन रचनाएँ जिन्होने मुझे प्रभावित किया-8

हिन्दी ब्लाग जगत की वे बेहतरीन रचनाएँ जिन्होने मुझे प्रभावित किया-8
- पंकज अवधिया

बाबूजी का मकान और मकान मे उनका फ्रेम


2 जनवरी, 2009 को माननीय रवीश कुमार जी के ब्लाग “कस्बा” मे माध्यम से की गयी यह प्रस्तुति मन को भारी कर देती है। एक पुत्र का कविता के माध्यम से अपने पिता को इस दर्द भरे अन्दाज मे याद करना, मैने शायद ही कही ऐसी बेहतरीन प्रस्तुति देखी होगी।

इस प्रस्तुति मे वे लिखते है-

“सिर्फ एक तस्वीर बन जायेंगे
एक ही कमीज़ में नज़र आयेंगे
वही चश्मा अब दिखेगा बार बार
सिर्फ सीध में ही देखते मिलेंगे
देखा तो लगा नहीं कि यही हैं
बाबूजी”

“दफ़्तर की इतनी गहमागहमी में भी अकेला हो जाता हूं। लगता है कि बाबूजी आ जाते तो सारी अधूरी बातें कह देता। एक बार छू लेता। अब कुछ भी हासिल नहीं लगता। पहले लगता था। इसलिए लगता था कि बाबूजी को बताता था। अब न इनाम में दिलचस्पी है न पदनाम में। लगता है कि दिन भर ढूंढता ही रह जाऊं बाबूजी को।“


http://naisadak.blogspot.com/2009/01/blog-post_02.html

भूमिका: हिन्दी ब्लाग परिवार मे शामिल होने के बाद मैने अनगिनत चिठ्ठे पढे और इनमे प्रकाशित विचारो/लेखो/निबन्धो/कहानियो ने मेरे जीवन को बहुत प्रभावित किया। यह मेरा कर्तव्य है कि मै फिर इन खूबसूरत मोतियो को आपके सामने प्रस्तुत करुँ ताकि आप हिन्दी ब्लागरो के अविस्मरणीय योगदान को एक बार फिर से जान सके।