Wednesday, January 9, 2008

मक्के के औषधीय गुणो के बारे मे जाने आज ज्ञान जी के चिठ्ठे से

मक्के के औषधीय गुणो के बारे मे जाने आज ज्ञान जी के चिठ्ठे से

कैसे मक्के के साधारण प्रयोग से आम रोगो से मुक्ति पायी जा सकती है, यह आज ज्ञान के चिठ्ठे पर पढे।

http://hgdp.blogspot.com/2008/01/blog-post_09.html

Sunday, January 6, 2008

पीलिया (जाँडिस) झाडना या उतारना : कितना सही कितना गलत

पीलिया (जाँडिस) झाडना या उतारना : कितना सही कितना गलत

हमारे विश्वास, आस्थाए और परम्पराए : कितने वैज्ञानिक, कितने अन्ध-विश्वास? के अंतरगत इस सप्ताह का विषय है पीलिया झाडना या उतारना : कितना सही या कितना गलत। आप इस लेख को आरम्भ मे पढ सकते है।

http://aarambha.blogspot.com/2008/01/blog-post.html

Saturday, January 5, 2008

कही फूट न पैदा कर दे यह पुरुस्कार

कही फूट न पैदा कर दे यह पुरुस्कार

कही फूट न पैदा कर दे

किसी एक को मिलने वाला पुरुस्कार

इस छोटे से ब्लाग जगत मे तो

हर कोई है इसका हकदार


सभी ओर है राजनीति

बचे इससे यह हमारा परिवार

बढती गुटबाजी देख मन मे

आया है ये विचार


पुरुस्कार की बजाय इस बार

बाँटे प्यार

कही फूट न पैदा कर दे

किसी एक को मिलने वाला पुरुस्कार

इस छोटे से ब्लाग जगत मे तो

हर कोई है इसका हकदार


हमारे लिये तो टिप्पणी ही

बडा उपहार

ग़ुटबाजी न कर दे

मन को बीमार

सब मिल कर मनाये रोज

खुशियो का त्यौहार

कही फूट न पैदा कर दे

किसी एक को मिलने वाला पुरुस्कार

इस छोटे से ब्लाग जगत मे तो

हर कोई है इसका हकदार


पंकज अवधिया दर्द हिन्दुस्तानी

© सर्वाधिकार सुरक्षित

Tuesday, January 1, 2008

ज्ञान जी के चिठ्ठे मे दिव्य औषधीय गुणो से युक्त हडजोड के विषय मे जाने

ज्ञान जी के चिठ्ठे मे दिव्य औषधीय गुणो से युक्त हडजोड के विषय मे

जाने

हडजोड के विषय मे रोचक जानकारी के लिये आज आप ज्ञान जी के चिठ्ठे पर पधारे। आज की पोस्ट जोडो के दर्द से सम्बन्धित है।

http://hgdp.blogspot.com/2008/01/blog-post_02.html

Sunday, December 30, 2007

हमारे विश्वास, आस्थाए और परम्पराए: कितने वैज्ञानिक कितने अन्ध-विश्वास?

हमारे विश्वास, आस्थाए और परम्पराए: कितने वैज्ञानिक कितने अन्ध-विश्वास?

इस विषय पर पहला आलेख झगडहीन (झगडा कराने वाली) नामक वनस्पति से जुडे विश्वास पर केन्द्रित है। आप इसे संजीव जी के चिठ्ठे आरम्भ मे पढ सकते है।

http://aarambha.blogspot.com/2007/12/chhattisgarh-1.html

Monday, December 24, 2007

पता नही कब तक यूँ बस लिखता रहूँगा

पता नही कब तक यूँ बस लिखता रहूँगा

पता नही कब तक यूँ

बस लिखता रहूँगा

प्रकृति को उजडते बेबस सा

तकता रहूँगा


मेरे अपने लोग कभी

सडक चौडी करते

तो कभी फैलने के लिये

दूसरे का जीवन हरते


कितने बार मै बूढे वृक्षो के साथ

नित कटता रहूँगा

पता नही कब तक यूँ

बस लिखता रहूँगा

प्रकृति को उजडते बेबस सा

तकता रहूँगा

पर्यावरण पर लिख कितनो का

जीवन बन गया

विनाश से बचाने वालो का

जंगलो के सीने पर ही तंबू तन गया


कब तक मै औरो की तरह

इन ठगो को सहता रहूँगा

पता नही कब तक यूँ

बस लिखता रहूँगा

प्रकृति को उजडते बेबस सा

तकता रहूँगा

क्या मेरा लेखन कभी

लालचियो के मन बदल पायेगा

क्या मुँह से पर्यावरण की दुहायी देते

पर कुल्हाडी चलाते हाथो को कुचल पायेगा


या यूँ ही पर्यावरणविद कहला अपने को

छलता रहूँगा

पता नही कब तक यूँ

बस लिखता रहूँगा

प्रकृति को उजडते बेबस सा

तकता रहूँगा

पंकज अवधिया दर्द हिन्दुस्तानी

© सर्वाधिकार सुरक्षित

घास पर जमी है ओस

घास पर जमी है ओस

घास पर जमी है ओस

चलो चले उस पर कुछ कोस

जरा नयी पीढी को भी

ले चले साथ

बताये कैसे हम पर है

माँ प्रकृति का हाथ


बटोरे इस स्नेह को

बनके मासूम निर्दोष

घास पर जमी है ओस

चलो चले उस पर कुछ कोस


बच्चे जब होंगे बडे तो ओस

तो होगी

पर तब प्रदूषण बना रहा होगा

सब को रोगी

ओस को भी होगा काँक्रीट जंगल

पर गिरने का तब अफसोस

घास पर जमी है ओस

चलो चले उस पर कुछ कोस


हम ही है जो गँवाते जा रहे है

वो जो हमारे लिये हितकर है

उसे भी जो हमारे साथ रहने वाले

असंख्य जीवो का घर है


आरोग्य छोड जो हम पीडा को चुने

इसमे प्रकृति का क्या दोष

घास पर जमी है ओस

चलो चले उस पर कुछ कोस

पंकज अवधिया दर्द हिन्दुस्तानी

© सर्वाधिकार सुरक्षित