क़ाश! जहरीले रतनजोत पर बहाया जा रहा पैसा
विदर्भ के किसानो को मिल जाता
क़र्ज तले दबे भूमि पुत्रो का
चेहरा खिल जाता
क्रिकेट मे बह रहा देश का पैसा
कुछ पल के लिये विदर्भ की ओर बह जाता
तो कर्ज मे दबा,
परिवार प्रमुख जीवित रह जाता
वायु यानो मे रोज सफर करने वाला,
समय की कमी का रोना रोता नेता
क़ुछ देर घर मे रुकता,
और खर्च किसानो को देता
तो विदर्भ के घरो मे फिर चूल्हा जल जाता
क़र्ज तले दबे भूमि पुत्रो का
चेहरा खिल जाता
दाता ही ना होगा तो हमे खिलायेगा कौन,
अपने सुख के लिये,
क्यो है हम इस पर मौन
क़रगिल के लिये जो जस्बा दिखाया था
उसी की अब फिर है जरुरत
ओ युवाओ! तुम्ही बदल सकते हो,
इस देश की सूरत
अन्नदाता को आदर देने वाला देश ही
फलता-फूलता है
अपने देश की तरह जहाँ रोज किसान
फांसी मे नही झूलता है
कह रहा हूँ आपको अपना जानकर
दूसरा होता तो कह ना पाता
क़ाश! रतनजोत पर बहाया जा रहा पैसा
विदर्भ के किसानो को मिल जाता
क़र्ज तले दबे भूमि पुत्रो का
चेहरा खिल जाता
पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’
Sunday, May 27, 2007
मै सोचता हूँ
‘मेरा किसान रोता है’
मेरा किसान पारम्परिक फसल छोड रोता है।
मेरा किसान अब रतनजोत बोता है॥
मेरा किसान भोला है जो बातो मे आ जाता है
इतने छल के बाद भी धोखा ही पाता है
हर बार उसी के साथ ऐसा क्यो होता है
मेरा किसान फसल छोड रोता है।
मेरा किसान अब रतनजोत बोता है॥
कौन जाने, कौन खरीदेगा इसे,
नही बिका तो शिकायत कहेगा किसे,
इसे खाकर बीमार होते बच्चो को देखकर
मन मसोसता है।
मेरा किसान फसल छोड रोता है।
मेरा किसान अब रतनजोत बोता है॥
‘विनाश के बीजो’ का सियासी खेल,
वो क्यो रहा झेल,
करे कोई, भरे कोई,
ऐसा कही होता है।
मेरा किसान फसल छोड रोता है।
मेरा किसान अब रतनजोत बोता है॥
घाटे की फसल, घाटॆ का सौदा
तिस पर मौत देने वाला पौधा
उसने तो सुख के लिये सपने देखते
अपना खेत जोता है।
मेरा किसान फसल छोड रोता है।
मेरा किसान अब रतनजोत बोता है॥
‘वे’ उपजाउ जमीन को बंजर बता,
बना रहे सचमुच बंजर,
कैसा ये हित है
कैसा है ये मंजर,
अपनो से धोखा खा, मेरा किसान अब आपा खोता है।
मेरा किसान फसल छोड रोता है।
मेरा किसान अब रतनजोत बोता है॥
जिसकी खेती नही वही इसकी करता है बात,
दो दिन की चान्दनी, फिर अन्धेरी रात,
मरिग मरिचिका से मेरा किसान सपने संजोता है,
मेरा किसान फसल छोड रोता है।
मेरा किसान अब रतनजोत बोता है॥
पंकज अवधिया ‘दर्द हिन्दुस्तानी’





